रविवार, 16 जुलाई 2023

क्या सर्वेश्वरी दुर्गा का उद्गमस्थल बिक चुका है ⁉️

ये हमारी कुल देवी है, इनके आराधना में रत 1602 ई0 से आजतक का हमारे पुरखों का स्वर्णिम कुर्सी नामा रहा है , इस पुनित कार्य मे चेरी वंश, सुगांव, बेतिया राज व अनेकों सक्षम लोगों का ससमय भरपूर सहयोग मिलते रहा है, 
कोर्ट औफ वाड्स कैसे इसे अधिग्रहित कर हमें शोषण, अतिक्रमण और बद्दुआ मजदूरी के महाजाल में जकड़ लिया, यह आज भी हम सनातनीयों के लिए एक दुविधा भरा महाप्रश्न है, 

ऐसे में कानून हाथ में लेकर नहीं बल्कि कानुन को साध लेकर हम धर्म रक्षकों का अंदोलित रहना स्वाभाविक ही है, 

 

दुर्गा बाग मंदिर का यह गर्भ गृह प्रवेश द्वार है, यहां दोनों ओर फूल मिठाई की दुकानें है, यहां खड़ा होने के लिए भी दुकानदारों के अनुमति की आवश्यकता पड़ती है,
यह मंदिर का यज्ञशाला है, इसके बगल में दिख रहा छोटा कमरा मंदिर के दर्शनार्थी महिलाओं के कपड़ा बदलने के लिए चेंजिंग रुम है,  जिसे सन 2021ई0 तक अपने नाम से मंदिर नीलाम कराने वाले सेतु सिंह अपना ताला लगा कर अपने कब्जा में रक्खे हुए हैं, जरुरतमंद को आज भी सशुल्क उपलब्ध कराते हैं 
यहां भक्त गण पुजा के पुर्ण फल प्राप्ति हेतु परिक्रमा करते है, जिन की संख्या तिथि या उत्सव विशेष पर बढ़ जाती है, ऐसे में किसी अप्रिय घटना से  बचाव के लिए हमारे संस्था द्वारा रेलिंग लगाया गया है, जिसे सराती बच्चे बार बार तोड़ कर खेलने के लिए बेखौफ होकर अपने साथ लेजाते हैं, हमारे द्वारा मना करने पर हमसे मारपीट करने केलिए  मंदिर भुमि पर बसे लोगों की फौज हर पल उपस्थित रहती है

गुरुवार, 27 मई 2021

आपातकाल की तैयारी


अ. ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ के कारण विश्‍व मे सागर के जलस्तर का बढना

आसान शब्दों में समझें तो ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ है ‘पृथ्वी के तापमान में वृद्धि और इसके कारण मौसम में होनेवाले परिवर्तन’ । पृथ्वी के तापमान में हो रही इस वृद्धि (जिसे १०० सालों के औसत तापमान पर १० फारेनहाईट आँका गया है।) के परिणाम स्वरूप बारिश के तरीकों में बदलाव, हिमखंडों और ग्लेशियरों के पिघलने, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और वनस्पति तथा जंतु जगत पर प्रभावों के रूप के सामने आ सकते हैं।ग्रीन हाउस गैस वो गैस होती है जो पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश कर यहां का तापमान बढाने में कारक बनती है ।  वैज्ञानिकों के अनुसार इन गैसों का उत्सर्जन अगर इसी प्रकार चलता रहा तो २१वीं शताब्दी में पृथ्वी का तापमान ३ डिग्री से ८ डिग्री सेल्सियस तक बढ सकता है । अगर ऐसा हुआ तो इसके परिणाम बहुत घातक होंगे । दुनिया के कई हिस्सों में बिछी बर्फ की चादरें पिघल सकती हैं, इससे समुद्र का जल स्तर कई फीट ऊपर बढ जाएगा । इससे दुनिया के कई हिस्से जलमग्न हो सकते हैं, भारी तबाही मच सकती है । यह तबाही किसी विश्‍वयुद्ध या किसी ‘ऐस्टेरॉइड’ के पृथ्वी से टकराने के बाद होने वाली तबाही से भी बढ़कर होगी । हमारे ग्रह पृथ्वी के लिये भी यह स्थिति बहुत हानिकारक होगी ।इस चेतावनी को गंभीरता से लेकर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विदोदोने २०१९ में ट्वीट कर कहा था ‘वर्तमान राजधानी जाकार्ता शहर पानी के नीचे जाने की संभावना होने से हमारे देश की राजधानी बोर्नियो द्वीपपर स्थानांतरित हो जाएगी ।’ किसी देश को अपनी राजधानी में बदलाव करना पडे, इससे हम परिस्थिति की गंभीरता समझ सकते हैं ।

१ आ. ‘कोरोना’ गुट के ‘कोविड-१९’ वायरस की विश्‍वमारी

वर्तमानकाल में हम इसी महामारी के आपातकाल से गुजर रहे हैं । चीन से प्रारंभ हुए इस महामारी को आज २ महिने में ही विश्‍वमारी घोषित किया गया है । आज तक इसके प्रकोप से हजारों लोगों की मृत्यु हो चुकी है और लाखों लोग इसके चपेट में आ चुके हैं । अब यह आंकडा कहां तक जाता है, यह हम भविष्य मे देखेंगे, पर आज तक तो इस महामारी के पर कोई दवाई उपलब्ध नहीं है

 २. आपातकाल क्यों आता है ?

पिछले एक दशक से हम पूरे विश्‍व में प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता में वृद्धि होते देख रहे हैं । प्रकृति के इस भयावह सामर्थ्य को अनुभव कर रहे हैं । कुछ समय पूर्व दक्षिण-पूर्वी एशिया एवं जापान में आई सुनामी, पाकिस्तान, हैती तथा चीन में हुए भूकंप, साथ ही कटरिना एवं उत्तर और मध्य अमरीका में आई अन्य चक्रवात आदि द्वारा हुए प्राकृतिक संकट देखे हैं । इन की तीव्रता के कारण हुआ घोर विध्वंस तथा जन-हानि हमारे मन पर अंकित हो गई है । हमें समझना होगा कि प्रकृति के इस कोप का कारण क्या है ?

२ अ. सेमेटिक विचारधारा के पंथ

अन्य पंथों में पुण्य की कोई संकल्पना ही नहीं है । उनके पंथ निर्माता के मार्गपर चलना पुण्यकारक माना गया है, तथा उसके विरुद्ध कृति करना पाप माना गया है । इन पंथों की धारणा है कि मानव सर्वश्रेष्ठ है और सारी सृष्टि केवल भोग के लिए है । इस कारण प्रकृति को अलग मानकर उसका दोहन करने की प्रवृत्ती बढी है । दुर्भाग्य से भारत मे भी पश्‍चिमी देशों के लोगों द्वारा बनाई गई शिक्षा प्रणाली चल रही है । इसलिए भारत मे भी आज की पीढी की भी वही प्रवृत्ति हो गई है । इसी कारण पर्यावरण का प्रदूषण करना, जंगल का विनाश करना आदि प्रवृत्तियां बढ रही हैं । जंगल का नाश होगा, तो वन में रहनेवाले प्राणी नागरी बस्तियों मे प्रवेश करेंगे, वर्षा अनियंत्रित होगी तथा ग्लोबल वॉर्मिंग में बढोतरी होगी । इस प्रकार मानव आपदाओंको आमंत्रित कर रहा है

२ आ. मानव का स्वार्थ

मानव की अपने हित को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति भी बढ गई है । अपने स्वार्थ के लिए सागर तथा नदी के क्षेत्र पर अतिक्रमण करना, पशुओं की हत्या करना, रासायनिक तथा जैविक शस्त्र बनाना, वायु तथा जल का प्रदूषण करनेवाले केमिकल्स बनाना, ऊर्जा का अतिरिक्त उपयोग करना आदि इसके उदाहरण हैं । इनके कारण भी अनेक आपदाओं का सामना करना पड रहा है । वर्तमानकाल की कोरोना वायरस की महामारी भी इसी का एक उदाहरण है ।इसी स्वार्थ की प्रवृत्ति के कारण आज सागरतट पर खारे पानी में उगनेवाली तथा तट की प्राकृतिक सुरक्षा करनेवाली मँग्रोव के जंगल काटकर उस जमीन पर अतिक्रमण किया जा रहा है । इससे त्सुनामी के प्रकोप से मानव की सुरक्षा के लिए प्रकृति द्वारा दिया सुरक्षाकवच ही हम नष्ट कर रहे हैं । इसका भयंकर परिणाम हमने त्सुनामी के समय देखा भी है ।

 ३. आध्यात्मिक परिपेक्ष्य से क्यों आता है वैश्‍विक संकट ?

कोरोना जैसी महामारी हो अथवा अन्य नैसर्गिक आपदा, हर कोई अपने ढंग से उसका कारण ढूंढता है । जैसे वैज्ञानिक हो, तो वह अपना तर्क बताते हैं कि यह आपदा क्यों आई और इसका परिणाम क्या होगा ? जबकि पत्रकार अपना तर्क लगाते हैं । पर हमें आपदा का आध्यात्मिक परिपेक्ष्य देखना है । इसलिए कि बिना आध्यात्मिक परिपेक्ष्य समझे हम आपदाओं को समझ नहीं पाएंगे ।

 3 अ. आध्यात्मिक परिपेक्ष्यकी विशेषता !

क्योंकि सृष्टि का संचालन किसी सरकार या आर्थिक महासत्ता द्वारा नहीं होता । सृष्टि का संचालन परमात्मा द्वारा होता है । इस संचालन का विज्ञान यदि हम नहीं समझेंगे, तो वैश्‍विक संकट को और उसके समाधान को कैसे समझ पाएंगे ? हम सौभाग्यशाली हैं कि हमारे धर्मग्रंथों में सृष्टि तथा उसके संचालन के विषय में स्थूल अध्ययन के साथ-साथ सूक्ष्म की भी स्पष्ट जानकारी दी गयी है ।कौशिकपद्धति नामक ग्रंथ में आपातकाल के कारण का वर्णन है ।

अतिवृष्टिः अनावृष्टिः शलभा मूषकाः शुकाः ।स्वचक्रं परचक्रं च सप्तैता ईतयः स्मृताः ॥इस श्‍लोक का अर्थ इसप्रकार है । राज्यकर्ता तथा प्रजा के धर्मपालन न करने से अतिवृष्टि, अनावृष्टि (अकाल), टिड्डियों का आक्रमण, चूहों अथवा तोतों (पोपट) का उपद्रव, एक-दूसरे में लढाइयां और शत्रु का आक्रमण, इस प्रकार के सात संकट राष्ट्र पर आते हैं ।

तात्पर्य : प्रजा एवं राजा, दोनों को धर्मपालन एवं साधना करनी चाहिए । तब ही आपातकाल की तीव्रता अल्प होकर आपातकाल सुसह्य होगा ।आध्यात्मिक परिपेक्ष्य के कुछ पहलु समझकर लेते हैं ।


३ आ. युगों का कालचक्र

हमारे शास्त्रों में सत्ययुग, द्वापरयुग, त्रेतायुग और कलियुग, ऐसे चार युगों का स्पष्ट उल्लेख है । वर्तमान में कलियुग के अंतर्गत चल रहे पांचवें कलियुग के अंत का समय है । इसके बाद कलियुग के अंतर्गत एक छोटासा सत्युग आएगा । अभी का समय छोटे कलियुग के अंत का है । कल्कि अवतार के समय के कलियुग का नहीं ।

३ इ. उत्पत्ति, स्थिति एवं लय, यह कालचक्र का नियम

युगपरिवर्तन, यह ईश्‍वरनिर्मित प्रकृति का एक नियम है । जो भी वस्तु उत्पन्न होती है, वह कुछ समय तक रहकर अंत में नष्ट हो जाती है । इसे उत्पत्ति, स्थिति एवं लय का नियम कहते हैं । उदाहरण के रूप में, हिमालय पर्वतशृंखला की उत्पत्ति हुई, वह कुछ काल तक रहेगी और अंत में नष्ट हो जाएगी । इस का अर्थ यह है कि जब इस विश्‍व में किसी वस्तु की उत्पत्ति होती है, कुछ काल तक रहने के पश्‍चात वह अवश्य नष्ट होगी । केवल निर्माता अर्थात ईश्‍वर ही चिरंतन एवं अपरिवर्तनीय है ।इस नियम के अनुसार अभी का समय कालचक्र में एक परिवर्तन का समय है । अर्थात दूसरे शब्दों में कहा जाए तो आपदाओं से प्रकृति अपना संतुलन बना रही है ।इसमें समझना होगा कि आपदाओं से जो नष्ट हो रहा है उसके अनेक मार्ग हैं, इसमें एक मार्ग है प्राकृतिक आपदाएं । नाश की इस प्रक्रिया में मानवजाति भी व्यवहार एवं आचरण द्वारा अपना योगदान देती है, जो युद्ध के रूप में सर्वनाश लाता है । इसकी मात्रा ७० % होती है ।इसमें, उत्पत्ति-स्थिति-लय (विनाश) इस कालचक्र के नियमानुसार रज-तम गुणी (पापी) लोगों की सबसे अधिक प्राणहानि होगी । इससे, वातावरण की एक प्रकारसे शुद्धि ही होती है । इस काल का उल्लेख अनेक भविष्यवेत्ताआें ने भी अपनी भविष्यवाणियों में किया है ।

3 ई. मनुष्य के कर्म तथा समष्टि प्रारब्ध !

वर्तमान कलियुग में मनुष्य का ६५ प्रतिशत जीवन प्रारब्ध के अनुसार और ३५ प्रतिशत क्रियमाण कर्म के अनुसार होता है । ३५ प्रतिशत क्रियमाण द्वारा हुए अच्छे-बुरे कर्मों का फल प्रारब्ध (भाग्य)के रूप में उसे भोगना पडता है । वर्तमान में धर्मशिक्षा और धर्माचरण के अभाव में समाज के अधिकांश लोगों से स्वार्थ या बढते तमोगुण के कारण समाज, राष्ट्र और धर्म की हानि हो रही है । यह गलत कर्म संपूर्ण समाज को भुगतने पडते हैं; क्योंकि समाज उसकी ओर अनदेखी करता है । इसीप्रकार, समष्टि के बुरे कर्मों का फल भी उसे प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सहना पडता है । जैसे आग में सूखे के साथ गीला भी जल जाता है । उसी प्रकार यह है ।इसके साथ ही समाज, धर्म और राष्ट्र का भी समष्टि प्रारब्ध होता है । २०१३ से २०२३ के कालखंड में मनुष्यजाति को कठिन समष्टि प्रारब्ध भोगना पड सकता है ।

३ उ. प्रकृति कैसे कार्य करती है ?

जिसप्रकार धूल तथा धुएं से स्थूल स्तर पर प्रदूषण होता है, उसीप्रकार बुद्धिअगम्य सूक्ष्म स्तर पर रज-तम का प्रदूषण होता है । समाज में सर्वत्र फैले अधर्म एवं साधना के अभाव के कारण मानव में रज-तम बढ जाने से वातावरण में भी रज-तम बढ गया है । इससे प्रकृति का ध्यान भी नहीं रखा जा रहा है ।रज-तम बढने का अर्थ है, सूक्ष्म स्तर पर पूरे विश्‍व में बुद्धिअगम्य आध्यात्मिक प्रदूषण होना । जिसप्रकार हम जिस घर में रहते हैं, वहां की धूल-गंदगी समय-समय पर स्थूलरूप में निकालते रहते हैं, उसीप्रकार प्रकृति भी सूक्ष्म स्तर पर वातावरण में रज-तम के प्रदूषण को हटाने एवं स्वच्छ करने के लिए प्रतिसाद देती है ।वास्तविकता यह है कि जब वातावरण में रज-तम का पलडा भारी हो है, तब यह अतिरिक्त रज-तम मूलभूत पांच वैश्‍विक तत्त्वों के माध्यम से (पंचमहाभूत) प्रभाव डालता है । इन पंचमहाभूतों के माध्यम से यह भूकंप, बाढ, ज्वालामुखी, चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि करता है ।मूलभूत पृथ्वीतत्त्व प्रभावित होने से उसकी परिणति भूकंप में होती है । मूलभूत आपतत्त्व प्रभावित होने से पानी में वृद्धि (बाढ आना अथवा अतिरिक्त हिमवर्षा होकर हिमयुग आना) अथवा न्यूनता (उदा. अकाल) होती है ।

 मनुष्य के स्वभाव में छुपा है, आपदाओं का कारण !

आज विश्‍व की आपदाओंका कारण कहीं न कहीं हमारे अनुचित व्यवहार का यह परिणाम है । लोग पृथ्वी पर उपलब्ध संसाधनों का बिना सोचे-समझे दुरुपयोग करते हैं । अनेकों को पता होते हुए भी वो अनुचित व्यवहार करते हैं, इसलिए कि उनका अहंकार और स्वार्थ उनको समाज का विचार नहीं करने देता । तीव्र अहंकार तथा स्वार्थी वृत्ति होने से, वे प्रकृति, मनुष्य तथा अन्य जीवों को कष्ट देकर अधिकतर समय केवल अपने लिए ही सुख जुटाने में लगे रहते हैं । सरकार कितना भी प्रयास करे । कानून बना ले, परंतु जब तक वह स्वयं अपने समाज ऋण को नहीं पहचानेगा, तब तक परिवर्तन असंभव है ।समाज में चुनिंदा लोग ही प्रकृति और समाज का विचार करते है । यदि उनके जीवन में हम झांककर देखें, तो वे धर्माचरण करनेवाले, दयालु स्वभाव के और सभी के प्रति प्रेम रखनवाले हैं । उनके व्यवहार में व्यापकता है । उनका आचरण हम सबको लोककल्याण करने की प्रेरणा देता है । उन्हें अधर्म का परिणाम पता है । कानून के दंड से भी अधिक प्रभावी है, व्यक्ति का आत्मसंयम ! जो केवल धर्म को समझने से और उसको जीवन में उतारने से आ सकता है ।

 ५. क्या आपातकाल रोकना संभव है ?

अब काल तो भीषण है, यह विज्ञान भी कह रहा है । कुछ लोगों के गलत कर्म और उसकी अनदेखी करनेवाले अन्य लोगों के कारण आज पूर्ण समाज को इस आपातकाल का परिणाम भुगतना पडेगा । मानव ने प्रकृति को इतना असंतुलित किया है कि अब प्रकृति अपना संतुलन बनाएगी । पर उसका परिणाम हम सभी को भुगतना पडेगा ।हमारा दुर्भाग्य यह है कि हमारी संस्कृति ही प्रकृति की पूजा करनेवाली थी । गोमाता, गंगानदी, बरगद, पीपल, गंगासागर, कैलाश पर्वत, मानसरोवर इस प्रकार हम वृक्ष से x`लेकर महासागर तक प्रकृति की पूजा करते थे । हमारी संस्कृति इस भूमि को पवित्र भारतमाता माननेवाली, पत्थर में भी भगवान देखकर उसे पूजनेवाली थी, परंतु विदेशी शिक्षापद्धति तथा कम्युनिस्ट विचारधारा के कारण हमने इसे निम्न दर्जे का मानना प्रारंभ किया । गौमाता को संभालने में हमें लाभ-हानि दिखाई देने लगी । धीरे धीरे हमने पश्‍चिम की और आकर्षित होकर अपने ऋषि-मुनियों और अपने पुरखों द्वारा संजोई आचरण पद्धति को ठुकरा दिया । विदेश में जो हो रहा है, वह अच्छा और हमारे प्रौढ व्यक्ति जो धर्म का ज्ञान देते हैं, वह पिछडा, यह मनोभाव भी हर भारतीय को संकेत दे रहा है, अब तो जाग जाओ ।

  • हमारे मनोभाव में केवल परिवर्तन ही नहीं हुआ, अपितु वह नीचे गिर गिर गया है ।
  • तुलसी की जगह मनीप्लांट ने ले ली ।
  • गोमाता की जगह कुत्तों ने ले ली ।
  • हमने हाथ जोडकर नमस्ते, राम-राम कहना छोडकर शेकहैंड करना प्रारंभ किया ।
  • जन्मदिनपर आरती उतारना छोडकर, केक काटना और फूंक मारकर मोमबत्ती बुझाना प्रारंभ किया ।
  • बाहर से घर में आते समय पैर धोना तो दूर की बात, जूते पहनकर हम घर में घूमने लगे ।
  • क्या खाना है, कब खाना है, कैसे खाना है, इसका भी हमनें ध्यान रखना छोड दिया ।
  • जूठा अथवा प्राणियों द्वारा सूंघा भोजन न खाना, जन्म-मृत्यु के समय सूतक रखना, आदि सभी हमारे आचारधर्म की बाते हमने पिछडेपन के नाम पर ठुकरा दीं । मंदिर जाने में हमें कमीपना लगने लगा ।
  • खेद है कि अज्ञानवश जिन बातों को हमने छोडा, उसको आज विदेश अपना रहा है ।

‘स्वाइन फ्ल्यू’ और अब ‘कोरोना’ के बाद पूरा विश्‍व नमस्ते कर रहा है !्डिस्कवरी चैनल यह शोध बता रहा है कि बच्चा जब जन्मदिन पर केक पर रखी मोमबत्ती बुझाता है, तो उसके मुंह के जिवाणु जाकर केकपर गिरते हैं । ऐसा केक खाना सेहत के लिए गलत है ।्करोना के बाद अब बाहर से आनेपर लोग स्नान कर रहे है, बार बार हाथ-पैर धो रहे हैं । परंतु हम क्यों भूल गए हमारे यहां संध्या होती थी । हमारे यहां बाहर से आने पर जूते निकालकर, हाथ-मूंह धोकर ही घर में प्रवेश होता । घर में होते, तो भी संध्या के समय हाथ-मूंह धोना एक नित्य आचार था ।हमारे धर्माचरण को स्वच्छता तक ही सीमित नहीं रखा था, स्वच्छता के साथ पवित्रता भी कैसे रहेगी, इतना गहरा चिंतन हमारा था ।पर हमने सब छोड दिया और अब उसके परिणाम हम भुगत रहे हैं ।केवल भोजन की बात करें । तो हमारे यहां केवल बाह्य सफाई का तो पूरा ध्यान था ही । पर भोजन बनाते समय मन में पवित्रता आए, इसलिए भगवान को भोग लगाने की व्यवस्था थी । भोजन को यज्ञ का स्थान देकर उससे पहले प्रार्थना होती थी । भोजन बनाना, परोसना, खाना आदि सभी के विषय में कुछ नियम थे । भोजन का एक अंश गोमाता और कुत्ते के लिए निकाला जाता था । इतना विलक्षण आचरण छोडकर, आज हमने अपनी क्या स्थिति बना ली है ? आज तो घर का ताजा भोजन छोडकर होटल, स्वीगी, झोमैटो से आ रहा खाना हमें पसंद है । विवाह और पार्टियों में हमें खडे होकर खाने में प्रतिष्ठा लगती है । फिर रोग तो होंगे ही न ? मानसिक बिमारियां भी आएंगी ही ।अभी भी समय है, हमें हमारे धर्म, संस्कृति की ओर लौटना होगा और पूरे विश्‍व को राह दिखानी होगी कि प्रकृति को संतुलित होना है, तो पूरब की ओर लौट चलें  ।

 अ. आपातकाल की तैयारी कैसी करनी चाहिए ?

आपातकाल की दृष्टि से भौतिक तैयारी

आपातकाल में चक्रवाती तूफान, भूकंप आदि के कारण बिजली की आपूर्ति बंद हो जाती है । पेट्रोल-डीजल आदि इंधन की किल्लत होने से यातायात की व्यवस्था भी रुक जाती है । उसके कारण रसोई गैस, खाने-पीने की वस्तुएं भी कई मास तक नहीं मिलतीं अथवा मिली, तो भी उनकी नियंत्रित आपूर्ति (रेशनिंग) की जाती है । आपातकाल में डॉक्टर, वैद्य, औषधियां, चिकित्सालय आदि की उपलब्धता होना लगभग असंभव होता है । यह सब ध्यान में लेते हुए आपातकाल का सामना करने हेतु सभी को शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक, आध्यात्मिक इत्यादि स्तरों पर पूर्वतैयारी करना आवश्यक है । आपातकाल की दृष्टि से आध्यात्मिक स्तर पर क्या व्यवस्था करनी चाहिए ?

आगामी काल में आनेवाली भीषण आपदाओं से रक्षा होने के लिए अच्छी साधना करना और भगवान का भक्त बनना आवश्यक है । इसके लिए अभी से प्रयत्न आरंभ करें ।

आ १. हम पर देवता की कृपादृष्टि होने के लिए और अपने सर्वओर सुरक्षा-कवच बनने के लिए आगे बताई बातें प्रतिदिन करें । देवपूजा करें । सायंकाल देवता और तुलसी के पास दीया जलाकर उसे नमस्कार करें । संध्याकाल दीया जलने बाद घर के सब लोग आराम से बैठकर स्वास्थ्य और सुरक्षा-कवच प्रदान करनेवाला श्‍लोक / स्तोत्र पाठ (उदा. रामरक्षास्तोत्र, मारुतिस्तोत्र, हनुमान चालीसा, देवीकवच आदि) करें । रातमें सोते समय बिछौने के चारों ओर देवताओं केे नामजप की सात्त्विक पट्टियों का चौकोर मंडल बनाएं और सुरक्षा के लिए उपास्यदेवता से प्रार्थना करें !" ॐ कुलदेेवी नम;""

आ २. आगामी तीसरे विश्‍वयुद्ध के समय छोडे जानेवाले परमाण्विक अस्त्रों के विकिरणों का वातावरण पर जो प्राणघातक प्रभाव पडेगा, उससे बचने के लिए प्रतिदिन अग्निहोत्र करें ।

आ ३. कोरोना विषाणुओं के विरुद्ध स्‍वयं में प्रतिरोध शक्‍ति बढाने के लिए आध्‍यात्मिक बल प्राप्‍त हो, इसके लिए ईश्‍वर द्वारा सुझाया नामजप करें !"" ॐ कुलदेवी नम;

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

बेतियाराज के मन्दिर कर्मियों का बंधुआ मजदूरी की प्रथा बंद हो

सेवा में,
      श्रीमान व्यवस्थापक महोदय , बेतिया राज
        अंडर कोर्ट-ऑफ वाड्स 
१९६६ ई० से हीं बिना किसी रख-रखाव, सफाई-सुरक्षा, पर्यटन-विकास व पोषण हींन मन्दिरों का डाक बंद हो ,बेतिया राज के मन्दिर व पुजारियों के बेलगाम शोषण व बंधुआ मजदूरी की प्रथा बंद हो तथा मन्दिर कर्मियों को भी कार्य अवधि के अनुशार भुगतान की व्यवस्था एवं अतिक्रमण मुक्ति की व्यवस्था किया जाय मुझे नया मन्दिर अधीक्षक बनाएं,ताकि रख रखाव की पूर्ववत व्यवस्ता रह सके,अन्यथा मन्दिर कर्मियों का कार्यक्षेत्र निति निर्धारित करके ठेकेदार परम्परा के अनुसार सभी मन्दिर मुझे 30 वर्षो के लिए समान्य व निर्धारित दर से किराये पर दिया जाय, इस पुनीत कार्य के लिए हम सब सपरिवार आपके आभारी रहेंगे, b9431491033@gmail.com / 238572 / 9470206447
सूचनार्थ
श्रीमान-जिलाधिकारी-महोदय,पच्छिम-चम्पार-बिहार                                    
श्रीमान-पुलिस-अधीक्षक-महोदय,महोदय, पच्छिम चम्पारण , बिहार                        

पुलिस-उप-महा-निरीक्षक-महोदय,चम्पारण,बिहार 

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

सरस्वती पूजा पर बिचार्नीय प्रश्न

मित्रो , सरस्वती पूजा  हिन्दुओं का महोत्सव है, हमे अपने अपने शिक्षण संस्थाओं में मनाना भी चाहिए, मै भी बेतिया समेत कई जगह पूजा करने जाता हूँ जहाँ पूजा की परोपकारी झलक दिखती है, ,..... वही कई जगह चंद आताताइयो द्वारा आक्रामक होकर रंगदारो की भांति मनाने की शास्त्र बिरोधी परम्परा अपनाने वालो रोके, बाहनों व आने जाने वाले पथिको को प्रताड़ित कर जबरन वशूली , अश्लील गानों पर नृत्य, एक परम्परागत कुरीति का रूप ले रहा है, जिसके चलते सरस्वती पूजा के कुछदिन पूर्व सेहीं तमाम बाहन चालको में अनिश्चित स्थानों पर अनियंत्रित तरीकों से वशुली का आतंक व्याप जाता है, माँ, सरस्वती पूजा उर्दू अमना समेत सभी शिक्षण संस्थानों में हो यह भी सुनिश्चित किया जाये,  वही अपनी रंगदारी दिखानेवाले व वसूलने वाले संस्थान का समाजिक बहिष्कार हो

बुधवार, 4 जनवरी 2017

भगवतीचरण बंदना की बाकी पंत्तियाअब आप सब माँ सर्वेश्वरी के भक्ति में लीन हो कर पूरा करें

जगसे होके मै निराश तेरे दरबार में आया हूँ, पूरा करदे मेरी आस,तेरे दरवार में आया हूँ, महिषासुर शुम्भ निशुम्भ ने जब,धरती पर अत्याचार किया, तूने रूप अनेको धरके माँ , उन दुष्टों का संहार किया, हल्का किया धरती का भार, तेरे दरबार में आया हूँ,स्नान ध्यान जप तप पूजा, तेरे चरणों में अर्पित है, जो कुछ भी है पास मेरे , मातेश्वरी तुझे समर्पित है,सर्वेश्वरी तुझे समर्पित है, पूरा करदे मेरी आस , तेरे दरवार में आया हूँ , जगसे होक मै........

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

समूह गान

||सर्वेश्वरी तू पहिमाम् शरणागतम,मातेश्वरी तू पाहिमाम शरणागतम,|| हे जगजननी तेरे शरण में मै रहू , मुझको तू अपनी भक्ति दे, परपीड़ा दूर कर सकूं, मुझको माँ अपनी शक्ति दे , तू शक्ति है इसजगकी, करो विश्व का कल्याण, शरणागतम ||सर्वेश्वरी तू पहिमाम् शरणागतम,मातेश्वरी तू पाहिमाम शरणागतम,|-शरणागतम, हे जगजननी तेरे शरण में आया हूँ रक्षा करो, पर-पिड्को से माँ मै घबडाया हूँ माँ रक्षा करो, तू शक्ती है इसजग की करो विश्व का कल्याण ,शरणागतम२  ||सर्वेश्वरी तू पहिमाम् शरणागतम२,मातेश्वरी तू पाहिमाम शरणागतम,|-शरणागतम,चारो तरफ है घोर अँधेरा यहाँ छाया हुआ, मानव अकेले है अपनी मानवता गवाया हुआ, अतिक्रमण हटा माँ इस जगसे , करो विश्व का कल्याण शरणागतम ||सर्वेश्वरी तू पहिमाम् शरणागतम,मातेश्वरी तू पाहिमाम शरणागतम,|-शरणागतम,तेरे शरण में मै रहूँ ,मुझको माँ अपनी भक्ति दे, पर-पीड़ा दूर कर सकू ,मुझको माँ अपनी शक्ति दे, तू शक्ति है इस जग की,करो विश्व का कल्याण, शरणागतम ||सर्वेश्वरी तू पहिमाम् शरणागतम,मातेश्वरी तू पाहिमाम शरणागतम,|-शरणागतम,

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

क्या तमाम सक्षम अधिकारी कार्यवाही करने में अक्षम है,अब जनता को ही मन्दिर से अतिक्रमण हटाना होगा

सेवा में ,
 श्रीमान जिलापदाधिकारी महोदय,
पश्चिम चम्पारण, बेतिया
विषय:- दुर्गाबाग परिषर में अतिक्रमण के सम्बन्ध में,
 महाशय,
उपयुक्त विषय के सम्बन्ध में हम सभी दुर्गा भक्तों का अनुरोध है,कि दुर्गाबाग परिसर के थाना नं० १३२ के खाता संख्या 2 के खेसरा ३१ से ३५ तक के तमाम बाग, भवन, भूखंड व तालाब दुर्गाबाग मन्दिर के है जिसका व्योरा प्रति संलग्न है, जिसके पश्चिम-उत्तरी कोने पर बेतिया राज के पूर्व अर्दली स्व०समसुल मिया को अस्थाई आवास के रूप में मन्दिर के हीं एक अतिथिशाला को आवंटित किया गया था, उनके मृत्योपरांत बन्शजो द्वारा उनकी निजी सम्पत्ति समझ कर आपसी बटवारा कर एक पुत्र अब्दुल द्वारा अवैध रूप से स्थाई-पक्का निर्माण व बिक्री भी बिना नक्शा मंजूरी के ही कराया जा रहा है, यह बहुत ही खेद की बात है, उसे रोकने व उन्हें वहाँ पुन: नही बसने देने के सम्बन्ध में शीघ्र कोई ठोस कदम उठाया जाये, अन्यथा प्रशासन के धीमे क्रिया कलाप से लोगो का विश्वास घटेगा,,
... यह मन्दिर परिसर के कागजातों के बिरुद्ध है, यहाँ तनाव बना हुआ है, यहाँ कभी भी अप्रिय घटना घट सकती है,जिसकी सुचना बेतिया राज मैनेजर को समय-समय देने के वावजूद अभी-भी निर्माण कार्य तीब्र गति से प्रगतिशील है,
अत: श्रीमान से करबद्ध अनुरोध है,कि उक्त अतिक्रमण हटवाने हेतु कृपा प्रदान की जाये, ताकी व्यवस्था शांतिपूर्ण रहे, नहीतो भविष्य में कोईभी अप्रिय घटना घटित हो सकती है, जिसकी पूर्ण जिम्मेदारी प्रशासन के धीमे क्रियान्वयन की होगी
                                           श्रीमान का विश्वासी
                राकेश चन्द्र झा बब्लू, खैरटिया बेतिया राज पुजारी
                      


प्रतिलिपि :-श्रीमान पुलिस उप महानिरीक्षक महोदय,चम्पारण क्षेत्र बेतिया

श्रीमान पुलिस अधीक्षक महोदय, पश्चिम चम्पारण, बेतियाबेतिया दुर्गाबाग मन्दिर परिषर में पनप रहे अतिक्रमण के सैलाब को रोक सकने में बिफल प्रसासन अनुमति दे ........+919431491033


सोमवार, 11 मई 2015

आओ हमसब अतिक्रमण को सैलाब रुप धारण के पुर्व हिं यहाँ के यात्रिओं के सुविधार्थ क्षेत्र सुविधाओ का विकाश करें

भारतवर्ष के बिहार राज्य के पच्छिम चम्पारण के मुख्यालय स्थित बेतिया शहर का गौरव, देवासुर संग्राम मे देवताओ के बिजय का प्रतिक चिन्ह, अनेको ऋषियोँ व राजबंशो का गौरव गाथा अपने मे समेटे यह नागर शैली की अनुपम कृती एवं प्रतीदिन अर्थाभाव एवं समय के थपेड़ो से घायल सार्वजनिक शोषण का शिकार यह दुर्गाबाग आज कोर्ट ऑफ वाड्स के अधिन अपने उद्धारक एवं सहयोगीयोँ की बाट जोह रहा है,आपके जनसहयोग से ही ये तमाम नितांत कार्य आपके सहयोग की गतिसे ही सम्पन्न कराये जाएंगे, - 1:-"मन्दिर मरम्मती व सौन्दर्य करण तथा रंग-रोगन" का कार्य
2:-"मंदिर के 11एकड़ 60डिसमिल भुखण्ड की चरदिवारी निर्माण", आठ गेट व फाटक निर्माण, मंदिर मे विशेष अवसरो पर उमड़ने वाली अनियंत्रित भीड़ को नियंत्रित व पंक्तिब्द्ध करने के लिए मंदिर के तालाब के पास के अति प्राचीन महाकाल मंदिर से माँ दुर्गा के गणेश मंदिर तक ओवर ब्रिज का निर्माण व व्यवस्था 
3:- हनुमान मंदिर के पूरब वाले भूखंड मे " बाहन पार्किँग, अष्टयाम स्थल,  खान-पान-स्थल, छेका-स्थल, यात्रीपड़ाव, सार्बजनिक-शौचालय तथा स्नानस्थल का निर्माण":-" व बैठका की व्यवस्था
4:-बाहरी तीर्थ-यात्रियों व अतिथियों के सुविधार्थ "36पलैट अत्याधुनिक सुबिधाओ से लैस धर्मशाला निर्माण तथा प्रवचन स्थल निर्माण आज अविलंब व नितांत है , आप इस लेख को अवश्य फौरवाड करे ताकी अग्रेसर की तलास करने मे हमसब भागिदार बने, अन्यथा अतिक्रमण के शैलाब को उस बचे हुए भुख्णड तक पहुचते देर नही लगेगी, रक्षा करे............

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

"धर्मशास्त्रो के अनुसार किसी भी प्राणी या संस्था के लिए उपकार करना ही मानवधर्म है"पूजा है, उसे अपना कर शाक्त समाज के सदस्य बने .......???

"धर्मशास्त्रो के अनुसार किसी भी प्राणी या संस्था के लिए उपकार करना ही मानवधर्म है"
........ शास्त्रबिधि को छोड़कर स्वेक्षाचरण करने वाले मानव न तो सुख को,न मोक्षको और न परम गती कोही प्राप्त करते है, यह सब जानते हुए भी आज का मानव परोपकार के बजाए परपीड़ा मे इतना रुचि क्यो ले रहा है यह हम शक्ति उपासको के लिए एक दुविधा भरा महा प्रश्न है
यहाँ प्रस्तुत है कुछ प्रमाणः-
(1) सत्यनारायण ब्रत कथा मे बिष्णु भगवान के प्रसन्नता के लिए चार से अधिक कदली स्तम्भो का पुजन कर उसे रोपित करने का विधान है 
. . आज शास्त्रीय मत के ठीक उलट हरे कदली स्तम्भो को पूजन मण्डप को सजाने के बहाने काटने का रिवाज सा चल पड़ा है,
(2)"उच्चैःपाठं निषिद्धं स्यात्त्वराँ च परिवर्जयेत"
. . . जबकी शास्त्र बर्जित लाउडस्पीकर, ध्वनि बिस्तारक व सिरकम्पी ध्वनि संसाधनो का प्रयोग आज हिन्दुओ के परम्परागत रिवाज जैसा बनते जा रहा है 
(3) पूजन सामग्री या चढ़ावन मे "अक्षत" (स्वेततिल) के स्थान पर "तण्डूल" (चावल) का प्रयोग होता है जबकी यह बिशर्जन समाग्री है
(4)पुजन समाग्री को लांघना या पैर से स्पर्श करना महा पाप है
जबकी आज के तमाम मंदिरो मेँ जल-चावल- प्रशाद-फुल-बेलपत्रादीके दुरुपयोग के चलते इसे जानते हुए भी उलंघन करना हमारी बिवशता बन गई है
(5)मंदिरो मे प्रत्येक पुजन कार्यो के लिए एक-एक स्थल कौड़ी-कौड़ी संग्रह से निर्मित तथा सञ्चालित होते है
आज वहाँ कइ आयोजक आयोजन शुल्क दिए ही बिना सम्पन्न कराना अपनी प्रतिष्ठा समझ रहे है
(6)शास्त्रो के मतानुशार "हमारा मन व दिल ही मंदिर है"उसे गंदा न होने दे
आनियंत्रित व स्वेक्षाचारी पुजा पद्यती के चलते हम नित्य ही उन्हे नुकशान तथा गंदगी का सैलाब भेँट कर आर्थिक क्षतीभी पहुँचा रहे है
(7) शास्त्रों के मतानुसार"बाँस ब कोयला के धुँआ से पुजन स्थल भी अपबित्र हो जाता है"
अतः इनका प्रयोग हवनादी पुजन मे भी बर्जित है
आज तमाम हिन्दु अपने देवताओ के समक्ष इस पुजा बर्जित समाग्री का "अगरबत्ती " का प्रयोग रिवाज के रुपमे कर रहे है (8)चैत्रादी नवरात्रि मे मंदिर की सफाई व श्रृंगार के बजाए उसे गन्दा व नुकसान पहूँचाने के भागिदार कही आपभितो नही बन रहे है??

कैप्शन जोड़ें

सोचिये हमसब होली में होलिका या प्रहलाद का अनुशरण करें ??????

"होली"

हिरण्यकश्यप की समर्थक बहन- होलिका के अग्नी- कुण्ड मे जलने और परम सात्विक बिष्णु भक्त हिरण्यकश्यप के पुत्र भक्त प्रहलाद के उसी अग्नीकुण्ड से सुरक्षित वापस आने की खुशी मे होली मनाया जाता है,
आज होली मे फुलो की सुगन्ध(इत्र,सेन्ट) लगाने,बस्त्र बाँटने, पुआ आदि 56 भोग खाने-खिलाने, कृष्ण भक्ती गित(जोगिरा) गाने और प्रहलादजी का अनुसरण करने के जगह हम सब हिरण्यकश्यपु का अनुशरण कर,पशुओ को मार कर खाने,नशापान करने और एक दुसरे को रंग और किचड़ लगाने, कपड़े फाड़ने तथा अशलिल सिडी बजाने की परम्परा क्यो अपना रहे है यह एक यक्ष महाप्रश्न है, समाधान हम सब को मिलकर ढ़ूँढ़ना है, धर्म के रक्षार्थ शाक्त समाज के सदस्य बने

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

छठ ब्रत


छठ ब्रत आज पुनः डूबते सूर्य (बुजूर्ग, रोगी-व- पागलको)प्रथम अर्घ(भोजन-व-सम्मान)का प्रथम हकदार बनानेकी सनातन परम्परा के संकल्प को पुनः दुहरा गया,इसे हम सब कब समझेंगे,इस ब्रत को अपना कर नारायणी व कत्यायन ऋषि की पुत्री माँ कत्यायनी (छठीमाँ) का आशीर्वाद प्राप्त करे पंडित राकेशचन्द्र झा बब्लू  b9431491033.blogspot.com , b9431491033@gmail.com ,06254-238572,

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

दीपावली पर यहभी विचारणीय है

किसी व्यक्ति या संस्थान के लिए किया गया उपकार ही पूजा है , फिर अष्टयाम में लाउडीस्पीकर या ध्वनि बिस्तारको के प्रयोग कर हम किसका भला कर रहे है हमे भीतो बतावे,एक सज्जन जोकि अपने अस्टयाम में ध्वनि बिस्तारक के प्रयोग करने के लिए ढेरों दलील दे रहे थे पर जब वापस अपने घर आये तो अपनेहीं पडोसी के यज्ञ में अपने घर के तरफ लगे लाउडीशपीकर का दिशा परिवर्तन करा कर अपने उस दब्बू पड़ोसी को कर्ण-कटु ध्वनि बिस्तारक के आवाज को झेलने पर विवश कर दिए,
मै  मानता हू की आपने अपने बेटे के नौकरी लगने के  के खुशी में  यह सब किया है, पर यह दूसरों को पीड़ा दे कर खुश होना देव उपासकों का दैविक गुण नही बल्कि दानवता है,
हमलोग भागवत आदि ज्ञान-यज्ञं में ध्वनि विस्तारकों  के प्रयोग के समर्थक है ,पर २४ घंटा मंत्रजप में ध्वनियों के बिस्तारकों के प्रयोग व डिस्पोजल समाग्रियो के प्रयोग की महत्ता  जो बेद वर्जित भी है मुझे तो समझ में नही आरही है,
दीपावली में माँ लक्ष्मी और पटाखा
मित्रो हिन्दू मान्यताओं के अनुसार दीपावली के दिन माँ लक्ष्मी हम तमाम मानवों के हर घर में अपने बाहन(उल्लू) पर सवार हो कर सुख-और-समृधि का आशीर्वाद प्रदान करने आती है, आज हम सब पूर्व से चली आ रही इसी परम्परा के अनुसार उनके स्वागत में दिए तो जलाते है , प्रसाद भोग भी लगाते है, लेकिन माँ लक्ष्मी को अपने घर के दिशा में आने से पहले ही हमसबके घरो से आनेवाले पटाखों के आवाज उनके लिए अवरोधक बन जाती है,जिस कारण हमसब माँ के आशीर्वाद से गत कुछेक बर्षोसे बंचित है, ...... इसवर्ष  आवाज  करने वाले पटाखों को  नही बजाने का संकल्प लें
निवेदक:- शक्त- समाज संचालक- विचार एकता वाले सदस्य बने -राकेश चन्द्र झा बब्लू दुर्गाबाग बेतिया 8877030112, 06254-238572 ,B94314910333.blogspot.comआप सब मित्रोसे करबद्ध प्रार्थना है कि आपसब मुझे अपने सुविचारो से अवश्य अवगत करावें, आपके इन्ही सुविचारो के बदौलत हमें अगले कदम का मार्गदर्शन मिलेगा, अष्टयाम मे ध्वनि विस्तारको का तथा दीपावली में पटाखों का प्रयोग नही हो   इसे पसंद या नापसंद करके या अपने टिप्पणियों द्वारा मुझे धर्मगुरु के नाते अपने विचारो से अवश्य अवगत करावे, ताकि मेरे द्वारा उठाया गया कोई कदम लोक निंदक न हो

गुरुवार, 14 मार्च 2013

चोरों के हवाले है बेतियाराज अंडर कोर्ट ऑफ वाड्स

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बिहार में बढ़ती चोरी की वारदात से आम लोग तो परेशान हैं ही, साथ यहां के राजा-महाराजा की आत्माएं भी बिहार सरकार को कोस रही होंगी.
बेतिया राज में कीमती सामानों की चोरी बेहद ही आम हो चुकी है. बेतिया राज में चोरों का आतंक इस कदर छाया हुआ है कि वे बेखौफ तरीके से एक के बाद दूसरी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं. एक नए घटनाक्रम में दो बोरा बर्तन लावारिस हालत में बेतिया राज परिसर से बरामद किए गए. ऐसी आशंका जताई जा रही है कि चोरों ने एक बार फिर से शीशमहल में सेंध लगा दी है. कुछ ही दिनों के भीतर एक व्यक्ति को शीश महल के समीप ही गिरफ्तार किया गया. जानकारी के मुताबिक चोर के पास से शीशे के पुराने झूमर के कुछ हिस्से एवं शीशे के दूसरे सामान भी बरामद किए गए. ये सामान बेतिया राज के शीश महल के ही हैं. हैरान कर देने वाली बात यह भी है कि शीश महल का एक दरवाजा भी खुली हालत में पाया गया. उधर गिरफ्तार किए गए चोर ने दावा किया कि वह नशे की हालत में था और उसने इस संबंध में किसी भी जानकारी से साफ इंकार कर दिया.
स्थानीय लोग इसके पीछे बेतिया राज के कर्मचारियों की मिलीभगत बताते हैं जबकि राज के कर्मचारी सारा दोष यहां के गरीब गार्डों पर मढ़ देते हैं. लेकिन गार्ड व अन्य लोगों का मानना है कि चाबी बेतिया राज के प्रधान लिपिक के  पास रहती है और दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इस घटना में ताला तोड़ा नहीं बल्कि खोला गया था. ऐसे में ये कर्मचारी गार्ड पर आरोप लगाकर अपने गुनाहों  पर परदा डालने की कोशिश कर रहे हैं. एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि चोरी किए गए पुरातात्विक सामान का मूल्य राज मैनेजर द्वारा 70 हज़ार रूपये आंका गया, जबकि सूत्रों के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में इसकी क़ीमत करोड़ों में है.
इससे पहले अक्तूबर, 2009 में भी राज के अभिलेखागार में चोरी की घटना हुई. लेकिन चोरों ने इस घटना में कौन सी परिसंपत्तियों की चोरी की, इस बात की कोई भी जानकारी राज की देखभाल कर रहे अधिकारियों के पास नहीं थी.  बहरहाल, बेतिया राज में चोरी का यह कोई नया मामला नहीं है. इससे पूर्व भी यहां कई बार क़ीमती सामानों की चोरियां हो चुकी हैं. जुलाई 2009 के महीने में शहर के राजकचहरी परिसर में स्थित ऐतिहासिक घड़ी की मशीन घड़ी घर का ताला खोलकर चोरी कर ली गयी थी, जिसके बारे में बताया जाता है कि इसे 1600 ईस्वी में बेतिया के तत्कालीन महाराज ने इंग्लैंड से मंगवाया था. इसकी खासियत यह थी कि इसमें चारों दिशाओं की दीवारों में लगी घड़ियां एक ही मशीन से चलती थीं. सूत्रों की मानें तो इस घड़ी के पेन्डुलम एवं इसकी मशीन में सोने एवं हीरे के हिस्से लगाए गये थे.
सन 2006 के अगस्त महीने में भी इसी बेतिया राज से एक लंदन की घड़ी एवं हाथी की दंत जड़ित टेबल की चोरी करने की कोशिश की गई थी. लेकिन स्थानीय लोगों एवं राहगीरों द्वारा देख लिए जाने की सूरत में चोर मौके से गायब हो गए. लोगों ने पीले रंग के एक झोले में रखी लंदन की रॉयल एक्सचेंज की कीमती घड़ी एवं हाथी की दंत जड़ित टेबल को राजकर्मी रामधारी साह को सुपुर्द कर दिया था. 2006 में इसी महीने बर्तनों की चोरी का मामला भी सामने आया था.
2000 के दशक में भी राजा के समय के फोटो और खिलौनों समेत अन्य बेशकीमती सामनों की चोरी भी की गयी थी. लेकिन ये सभी चोरी के मामले आज तक पुलिस के अनुसंधान और सीआईडी की जांच में उलझे हुए हैं. कोई नतीजा अभी तक नहीं निकल सका है.
बेतिया राज के ऐतिहासिक कालीबाग मंदिर में साल 1996 में अज्ञात चोरों ने मुख्य मंदिर के समक्ष से बटुक भैरव की मूर्ति चुरा ली थी. इस मामले भी अभी तक कुछ नहीं हो सका है.
90 के दशक में बेतिया राज के खजाने की मज़बूत चादर काटकर कीमती आभूषणों, पत्थर आदि की चोरी कर ली गयी थी. इस मामले में बेतिया राज की ओर से दो करोड़ की संपत्ति की चोरी का मामला नगर थाने में दर्ज कराया गया था. हालांकि स्थानीय लोगों का मानना है कि इससे कई गुना ज़्यादा की सम्पत्ति चोरी हुई थी. यहां कि स्थानीय लोग इसे एशिया की सबसे बड़ी चोरी मानते हैं. कहा जाता है कि इस चोरी में हैलीकाप्टर का इस्तेमाल किया गया था और कई दिनों तक लगातार रात में छत को मशीन के ज़रिए काटा गया था, क्योंकि छत की ज़मीन लोहे की मज़बूत चादरों से बनाई गई थी.
ऐसे में अगर देखा जाए तो आरंभ से ही ऐतिहासिक बेतिया राज के मंदिरों एवं उसके अन्य धरोहरों पर चोरों की नज़र है. लेकिन बिहार सरकार की तरफ़ से इस राज की संपदा को संरक्षित रखने की दिशा में कोई सशक्त सरकारी पहल नहीं दिख रही है. इतनी बड़ी सम्पत्ति की रखवाली की ज़िम्मेदारी डंडे वाले चौकीदार से कराई जा रही है. उलझाने वाला सवाल यही है कि आखिर डंडे वाले इन चौकीदार से कैसे हो सकती है बेतिया राज के अरबों की संपत्तियों की रखवाली?
गौरतलब है कि बेतिया राज की प्रशासनिक नियंत्रण एवं सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह बिहार सरकार के ऊपर है. लेकिन स्थिति यह है कि सरकारी नियंत्रण होने के बावजूद राज की अरबों की संपत्तियों की सुरक्षा सिर्फ एक-दो सिपाहियों के जिम्मे कर दी गई है. इस तरह से सुरक्षा के नाम पर मजाक और खिलवाड़ किया जा रहा है.
अब सवाल उठता है कि क्या बेतिया राज की धरोहरों और अवशेषों की सुरक्षा ज़रूरी नहीं है, अगर ज़रूरी है, तो फिर इसकी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन हैं? क्या सरकार और प्रशासन को इनके सदुपयोग की कोई चिंता नहीं है, हकीकत यह है कि अगर सरकार चाहे तो बेतिया राज से जुड़े स्मारकों और महल के अवशेषों को पर्यटन से जोड़कर इन्हें दुनिया के सामने पेश कर सकती है, लेकिन ज़रूरत इच्छाशक्ति और स्वार्थरहित मानसिकता की है, जो शायद वर्तमान हालात में सरकार और प्रशासन के पास नहीं है.
यहाँ हीं  पुजारी के रूप में मेरे रात्री-विश्राम की व्यवस्था राज प्रबन्धक द्वारा किया गयाहै 
आखिर में हम आपको बताते चलें कि INSAAN International Foundation” ने इस संबंध में बेतिया के ज़िला अधिकारी को एक आरटीआई भेज कर पूछा था कि 15 अगस्त, 1947 से लेकर अब तक बेतिया राज की सम्पत्ति में चोरी के कितने मामले दर्ज हुए हैं. सारे मामलों में दर्ज एफआईआर की फोटो-कापी उपलब्ध कराई जाए और साथ ही यह भी बताएं कि पुलिस प्रशासन इन मामलों में अब तक क्या कार्रवाई की है. लेकिन अफसोस बेतिया के जिला अधिकारी महोदय की तरफ से कोई सूचना अब तक नहीं दी गई है.वही चोरी का अविराम सिलसिला बेलगाम चल रहा है, कलभी दिनांक 15-03-2013 को प्रात: काल में ही चोरो द्वारा प्रयोग में लाई गई गैस कटर,टांगी व अन्य सामग्रियों को पुलिश द्वारा बरामद किया गया है लेकिन चोरी गये समानो की सूचि संवाद लिखे जाने के समय तक अनुपलब्ध है 
बेतिया राज का इतिहास:
मुग़ल कालीन हिन्दुस्तान में सम्राट अकबर के समय बिहार सूबे को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित कर 6 अलग-अलग सरकारें कायम की गई थी, जिनमें से चम्पारण भी एक था. बताया जाता है कि 1579 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा में विद्रोह हो गया. सम्राट को कमज़ोर समझ अफगान के पठान भी बागी हो गए, बंजारों का लूट-पाट इतना बढ़ गया कि सम्राट अकबर चिन्तित हो गए. उनके दरबार में एक सेनापति उदय करण सिंह थे. इस विद्रोह को दबाने का भार उन्हें सौंपा गया. पटना के पास गंगा पार करते ही हाजीपुर में उदय करण सिंह का मुकाबला बंजारों से हो गया. लड़ाई में कुछ बंजारे मारे गए और बाकी बन्दी बना लिए गए. इसके बाद पूरा विद्रोह शान्त व खत्म हो गया.
सम्राट अकबर को जब इस जीत की सूचना मिली तो उन्होंने उदय करण सिंह को इनाम स्वरूप चम्पारण सरकार की बागडोर सौंपने का आदेश दे दिया. अकबर के जीवन पर्यन्त उदय करण सिंह एवं उनके बाद उदय करण सिंह के लड़के जदु सिंह चम्पारण की देखभाल करते रहे. इतिहास गवाह है कि राजा की उपाधि जदु सिंह के लड़के उग्रसेन सिंह को सम्राट शाहजहां के शासनकाल में सन् 1629 में दी गई. अर्थात बेतिया राज के प्रथम राजा उग्रसेन सिंह कहलाए. सन 1659 में उग्रसेन सिंह का देहान्त हो गया. उनके बाद उग्रसेन सिंह के एकमात्र पुत्र गज सिंह राजा बने जो 1694 तक राज करके स्वर्ग सिधार गए. इनके सबसे बड़े लड़के दिलीप सिंह को 1694 में राजा बनाया गया, लेकिन 1715 में यह भी परलोक वासी हो गए. इसके बाद इनके बड़े पुत्र ध्रुव सिंह को राजा बनाया गया. यह अब तक के सबसे सफल राजा माने गए. इन्होंने ही सुगांव से हटाकर बेतिया को अपनी राज की राजधानी बनाया.
कहा जाता है कि ध्रुव सिंह को कोई पुत्र नहीं हुआ. केवल दो लड़कियां हुई. ध्रुव सिंह ने देखा कि उनके पुत्र हीन होने के चलते उनका राज भाईयों के हाथ चला जाएगा, यही सोच कर उन्होंने अपने जीवन काल में ही अपने पुत्री के पुत्र युगलकिशोर सिंह को राज तिलक देकर राजा बना दिया. इस तरीके से ध्रुव सिंह ने अपने भाईयों के हाथ रियासत की सत्ता जाने से बचा तो ली मगर परिवार के बीच खाई जरूर पड़ गई. ध्रुव सिंह की मृत्यु 1762 में हो गई.
ध्रुव सिंह के मृत्यु के बाद राजा युगलकिशोर सिंह के ताज में कांटें लग गए. एक तरफ नाना के भाईयों का विरोध और दूसरी तरफ ईस्ट इंडिया कम्पनी की दहशत.. तनाव में आकर वे 1766 में ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरूद्ध विद्रोह कर बैठे. विद्रोह दबाने के लिए कोलोनेल बारकर की अगुवाई में ईस्ट इंडिया कम्पनी के सिपाहियों ने बेतिया राज पर चढ़ाई कर दी। आखिरकार युगलकिशोर को भागना पड़ा. राजा युगलकिशोर के भागने के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी ने पूरे चम्पारण सरकार को अपने कब्ज़े में ले लिया.
वे पटना राजस्व परिषद द्वारा निर्गत परवाने के अनुपालन में सारण सरकार के सुपरवाइजर के समक्ष 25 मई 1771 को उपस्थित हुए और आत्म-समर्पण के बाद अगस्त 1771 में परगना मझौआ एवं सिमरौन हेतु अम्लदस्तक तैयार कर उन्हें दे दिया गया. युगलकिशोर सिंह की मृत्यु 1784 में हो गई, इसके बाद उनके पुत्र बृजकिशोर सिंह अपने पिता का मालिकाना हक पाते रहे. 1816 में यह भी दुनिया छोड़ कर चले गए.
इसके बाद इनके बड़े लड़के आनन्द किशोर सिंह ने सारण के कलेक्टर के यहां दाखिल खारिज कराकर एवं कुछ शर्तो को कबूल करके बेतिया राज को प्राप्त किया और इन्हें इस समय महाराजा की उपाधि से विभूषित किया गया. आनन्द किशोर सिंह संगीत प्रेमी थे, इन्हीं के समय ध्रुपद गायन की परम्परा बेतिया में चली. 29 जनवरी 1838 को महाराजा आनन्द किशोर स्वर्ग सिधार गए. इन्हें कोई संतान नहीं थी, इसलिए उनके भाई नवल किशोर राजा हुए. इन्होंने बेतिया राज का काफी विस्तार किया और 25 सितम्बर 1855 को यह भी काल के गाल में समा गए. इसके बाद पहली पत्नी के पुत्र राजेन्द्र किशोर सिंह गद्दी पर बैठे. इन्होंने बेतिया राज का काफी विस्तार किया. इनके दौर में ही बेतिया में रेलवे लाईन बिछी और ट्रेन चली. बेतिया का तारघर भी इनके कार्यकाल में बना. इन्होंने ही बनारस में अवतल बनवाएं और इलाहाबाद में घर खरीदा, (विशेष बात यह है कि इसी घर को देखने के लिए  सिनेमा जगत के महानायक अमिताभ बच्चन ने बचपन में चोरी की थी.) 28 दिसम्बर 1883 को वे भी भगवान के प्यारे हो गए.
इनके मौत के बाद महाराजा हरेन्द्र किशोर राजगद्दी पर बैठे. और यही बेतिया राज के अंतिम महाराजा थे. इन्हें कोई संतान नहीं थी. 24 मार्च 1893 को इस दुनिया को अलविदा कह गए. इनकी दूसरी पत्नी 27 नवम्बर 1954 तक बेतिया राज दरबार को रौशन रखा. उसके बाद से बेतिया राज हमेशा-हमेशा के लिए अंधेरे में चला गया