बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

छठ ब्रत


छठ ब्रत आज पुनः डूबते सूर्य (बुजूर्ग, रोगी-व- पागलको)प्रथम अर्घ(भोजन-व-सम्मान)का प्रथम हकदार बनानेकी सनातन परम्परा के संकल्प को पुनः दुहरा गया,इसे हम सब कब समझेंगे,इस ब्रत को अपना कर नारायणी व कत्यायन ऋषि की पुत्री माँ कत्यायनी (छठीमाँ) का आशीर्वाद प्राप्त करे पंडित राकेशचन्द्र झा बब्लू  b9431491033.blogspot.com , b9431491033@gmail.com ,06254-238572,

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

दीपावली पर यहभी विचारणीय है

किसी व्यक्ति या संस्थान के लिए किया गया उपकार ही पूजा है , फिर अष्टयाम में लाउडीस्पीकर या ध्वनि बिस्तारको के प्रयोग कर हम किसका भला कर रहे है हमे भीतो बतावे,एक सज्जन जोकि अपने अस्टयाम में ध्वनि बिस्तारक के प्रयोग करने के लिए ढेरों दलील दे रहे थे पर जब वापस अपने घर आये तो अपनेहीं पडोसी के यज्ञ में अपने घर के तरफ लगे लाउडीशपीकर का दिशा परिवर्तन करा कर अपने उस दब्बू पड़ोसी को कर्ण-कटु ध्वनि बिस्तारक के आवाज को झेलने पर विवश कर दिए,
मै  मानता हू की आपने अपने बेटे के नौकरी लगने के  के खुशी में  यह सब किया है, पर यह दूसरों को पीड़ा दे कर खुश होना देव उपासकों का दैविक गुण नही बल्कि दानवता है,
हमलोग भागवत आदि ज्ञान-यज्ञं में ध्वनि विस्तारकों  के प्रयोग के समर्थक है ,पर २४ घंटा मंत्रजप में ध्वनियों के बिस्तारकों के प्रयोग व डिस्पोजल समाग्रियो के प्रयोग की महत्ता  जो बेद वर्जित भी है मुझे तो समझ में नही आरही है,
दीपावली में माँ लक्ष्मी और पटाखा
मित्रो हिन्दू मान्यताओं के अनुसार दीपावली के दिन माँ लक्ष्मी हम तमाम मानवों के हर घर में अपने बाहन(उल्लू) पर सवार हो कर सुख-और-समृधि का आशीर्वाद प्रदान करने आती है, आज हम सब पूर्व से चली आ रही इसी परम्परा के अनुसार उनके स्वागत में दिए तो जलाते है , प्रसाद भोग भी लगाते है, लेकिन माँ लक्ष्मी को अपने घर के दिशा में आने से पहले ही हमसबके घरो से आनेवाले पटाखों के आवाज उनके लिए अवरोधक बन जाती है,जिस कारण हमसब माँ के आशीर्वाद से गत कुछेक बर्षोसे बंचित है, ...... इसवर्ष  आवाज  करने वाले पटाखों को  नही बजाने का संकल्प लें
निवेदक:- शक्त- समाज संचालक- विचार एकता वाले सदस्य बने -राकेश चन्द्र झा बब्लू दुर्गाबाग बेतिया 8877030112, 06254-238572 ,B94314910333.blogspot.comआप सब मित्रोसे करबद्ध प्रार्थना है कि आपसब मुझे अपने सुविचारो से अवश्य अवगत करावें, आपके इन्ही सुविचारो के बदौलत हमें अगले कदम का मार्गदर्शन मिलेगा, अष्टयाम मे ध्वनि विस्तारको का तथा दीपावली में पटाखों का प्रयोग नही हो   इसे पसंद या नापसंद करके या अपने टिप्पणियों द्वारा मुझे धर्मगुरु के नाते अपने विचारो से अवश्य अवगत करावे, ताकि मेरे द्वारा उठाया गया कोई कदम लोक निंदक न हो

गुरुवार, 14 मार्च 2013

चोरों के हवाले है बेतियाराज अंडर कोर्ट ऑफ वाड्स

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बिहार में बढ़ती चोरी की वारदात से आम लोग तो परेशान हैं ही, साथ यहां के राजा-महाराजा की आत्माएं भी बिहार सरकार को कोस रही होंगी.
बेतिया राज में कीमती सामानों की चोरी बेहद ही आम हो चुकी है. बेतिया राज में चोरों का आतंक इस कदर छाया हुआ है कि वे बेखौफ तरीके से एक के बाद दूसरी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं. एक नए घटनाक्रम में दो बोरा बर्तन लावारिस हालत में बेतिया राज परिसर से बरामद किए गए. ऐसी आशंका जताई जा रही है कि चोरों ने एक बार फिर से शीशमहल में सेंध लगा दी है. कुछ ही दिनों के भीतर एक व्यक्ति को शीश महल के समीप ही गिरफ्तार किया गया. जानकारी के मुताबिक चोर के पास से शीशे के पुराने झूमर के कुछ हिस्से एवं शीशे के दूसरे सामान भी बरामद किए गए. ये सामान बेतिया राज के शीश महल के ही हैं. हैरान कर देने वाली बात यह भी है कि शीश महल का एक दरवाजा भी खुली हालत में पाया गया. उधर गिरफ्तार किए गए चोर ने दावा किया कि वह नशे की हालत में था और उसने इस संबंध में किसी भी जानकारी से साफ इंकार कर दिया.
स्थानीय लोग इसके पीछे बेतिया राज के कर्मचारियों की मिलीभगत बताते हैं जबकि राज के कर्मचारी सारा दोष यहां के गरीब गार्डों पर मढ़ देते हैं. लेकिन गार्ड व अन्य लोगों का मानना है कि चाबी बेतिया राज के प्रधान लिपिक के  पास रहती है और दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इस घटना में ताला तोड़ा नहीं बल्कि खोला गया था. ऐसे में ये कर्मचारी गार्ड पर आरोप लगाकर अपने गुनाहों  पर परदा डालने की कोशिश कर रहे हैं. एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि चोरी किए गए पुरातात्विक सामान का मूल्य राज मैनेजर द्वारा 70 हज़ार रूपये आंका गया, जबकि सूत्रों के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में इसकी क़ीमत करोड़ों में है.
इससे पहले अक्तूबर, 2009 में भी राज के अभिलेखागार में चोरी की घटना हुई. लेकिन चोरों ने इस घटना में कौन सी परिसंपत्तियों की चोरी की, इस बात की कोई भी जानकारी राज की देखभाल कर रहे अधिकारियों के पास नहीं थी.  बहरहाल, बेतिया राज में चोरी का यह कोई नया मामला नहीं है. इससे पूर्व भी यहां कई बार क़ीमती सामानों की चोरियां हो चुकी हैं. जुलाई 2009 के महीने में शहर के राजकचहरी परिसर में स्थित ऐतिहासिक घड़ी की मशीन घड़ी घर का ताला खोलकर चोरी कर ली गयी थी, जिसके बारे में बताया जाता है कि इसे 1600 ईस्वी में बेतिया के तत्कालीन महाराज ने इंग्लैंड से मंगवाया था. इसकी खासियत यह थी कि इसमें चारों दिशाओं की दीवारों में लगी घड़ियां एक ही मशीन से चलती थीं. सूत्रों की मानें तो इस घड़ी के पेन्डुलम एवं इसकी मशीन में सोने एवं हीरे के हिस्से लगाए गये थे.
सन 2006 के अगस्त महीने में भी इसी बेतिया राज से एक लंदन की घड़ी एवं हाथी की दंत जड़ित टेबल की चोरी करने की कोशिश की गई थी. लेकिन स्थानीय लोगों एवं राहगीरों द्वारा देख लिए जाने की सूरत में चोर मौके से गायब हो गए. लोगों ने पीले रंग के एक झोले में रखी लंदन की रॉयल एक्सचेंज की कीमती घड़ी एवं हाथी की दंत जड़ित टेबल को राजकर्मी रामधारी साह को सुपुर्द कर दिया था. 2006 में इसी महीने बर्तनों की चोरी का मामला भी सामने आया था.
2000 के दशक में भी राजा के समय के फोटो और खिलौनों समेत अन्य बेशकीमती सामनों की चोरी भी की गयी थी. लेकिन ये सभी चोरी के मामले आज तक पुलिस के अनुसंधान और सीआईडी की जांच में उलझे हुए हैं. कोई नतीजा अभी तक नहीं निकल सका है.
बेतिया राज के ऐतिहासिक कालीबाग मंदिर में साल 1996 में अज्ञात चोरों ने मुख्य मंदिर के समक्ष से बटुक भैरव की मूर्ति चुरा ली थी. इस मामले भी अभी तक कुछ नहीं हो सका है.
90 के दशक में बेतिया राज के खजाने की मज़बूत चादर काटकर कीमती आभूषणों, पत्थर आदि की चोरी कर ली गयी थी. इस मामले में बेतिया राज की ओर से दो करोड़ की संपत्ति की चोरी का मामला नगर थाने में दर्ज कराया गया था. हालांकि स्थानीय लोगों का मानना है कि इससे कई गुना ज़्यादा की सम्पत्ति चोरी हुई थी. यहां कि स्थानीय लोग इसे एशिया की सबसे बड़ी चोरी मानते हैं. कहा जाता है कि इस चोरी में हैलीकाप्टर का इस्तेमाल किया गया था और कई दिनों तक लगातार रात में छत को मशीन के ज़रिए काटा गया था, क्योंकि छत की ज़मीन लोहे की मज़बूत चादरों से बनाई गई थी.
ऐसे में अगर देखा जाए तो आरंभ से ही ऐतिहासिक बेतिया राज के मंदिरों एवं उसके अन्य धरोहरों पर चोरों की नज़र है. लेकिन बिहार सरकार की तरफ़ से इस राज की संपदा को संरक्षित रखने की दिशा में कोई सशक्त सरकारी पहल नहीं दिख रही है. इतनी बड़ी सम्पत्ति की रखवाली की ज़िम्मेदारी डंडे वाले चौकीदार से कराई जा रही है. उलझाने वाला सवाल यही है कि आखिर डंडे वाले इन चौकीदार से कैसे हो सकती है बेतिया राज के अरबों की संपत्तियों की रखवाली?
गौरतलब है कि बेतिया राज की प्रशासनिक नियंत्रण एवं सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह बिहार सरकार के ऊपर है. लेकिन स्थिति यह है कि सरकारी नियंत्रण होने के बावजूद राज की अरबों की संपत्तियों की सुरक्षा सिर्फ एक-दो सिपाहियों के जिम्मे कर दी गई है. इस तरह से सुरक्षा के नाम पर मजाक और खिलवाड़ किया जा रहा है.
अब सवाल उठता है कि क्या बेतिया राज की धरोहरों और अवशेषों की सुरक्षा ज़रूरी नहीं है, अगर ज़रूरी है, तो फिर इसकी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन हैं? क्या सरकार और प्रशासन को इनके सदुपयोग की कोई चिंता नहीं है, हकीकत यह है कि अगर सरकार चाहे तो बेतिया राज से जुड़े स्मारकों और महल के अवशेषों को पर्यटन से जोड़कर इन्हें दुनिया के सामने पेश कर सकती है, लेकिन ज़रूरत इच्छाशक्ति और स्वार्थरहित मानसिकता की है, जो शायद वर्तमान हालात में सरकार और प्रशासन के पास नहीं है.
यहाँ हीं  पुजारी के रूप में मेरे रात्री-विश्राम की व्यवस्था राज प्रबन्धक द्वारा किया गयाहै 
आखिर में हम आपको बताते चलें कि INSAAN International Foundation” ने इस संबंध में बेतिया के ज़िला अधिकारी को एक आरटीआई भेज कर पूछा था कि 15 अगस्त, 1947 से लेकर अब तक बेतिया राज की सम्पत्ति में चोरी के कितने मामले दर्ज हुए हैं. सारे मामलों में दर्ज एफआईआर की फोटो-कापी उपलब्ध कराई जाए और साथ ही यह भी बताएं कि पुलिस प्रशासन इन मामलों में अब तक क्या कार्रवाई की है. लेकिन अफसोस बेतिया के जिला अधिकारी महोदय की तरफ से कोई सूचना अब तक नहीं दी गई है.वही चोरी का अविराम सिलसिला बेलगाम चल रहा है, कलभी दिनांक 15-03-2013 को प्रात: काल में ही चोरो द्वारा प्रयोग में लाई गई गैस कटर,टांगी व अन्य सामग्रियों को पुलिश द्वारा बरामद किया गया है लेकिन चोरी गये समानो की सूचि संवाद लिखे जाने के समय तक अनुपलब्ध है 
बेतिया राज का इतिहास:
मुग़ल कालीन हिन्दुस्तान में सम्राट अकबर के समय बिहार सूबे को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित कर 6 अलग-अलग सरकारें कायम की गई थी, जिनमें से चम्पारण भी एक था. बताया जाता है कि 1579 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा में विद्रोह हो गया. सम्राट को कमज़ोर समझ अफगान के पठान भी बागी हो गए, बंजारों का लूट-पाट इतना बढ़ गया कि सम्राट अकबर चिन्तित हो गए. उनके दरबार में एक सेनापति उदय करण सिंह थे. इस विद्रोह को दबाने का भार उन्हें सौंपा गया. पटना के पास गंगा पार करते ही हाजीपुर में उदय करण सिंह का मुकाबला बंजारों से हो गया. लड़ाई में कुछ बंजारे मारे गए और बाकी बन्दी बना लिए गए. इसके बाद पूरा विद्रोह शान्त व खत्म हो गया.
सम्राट अकबर को जब इस जीत की सूचना मिली तो उन्होंने उदय करण सिंह को इनाम स्वरूप चम्पारण सरकार की बागडोर सौंपने का आदेश दे दिया. अकबर के जीवन पर्यन्त उदय करण सिंह एवं उनके बाद उदय करण सिंह के लड़के जदु सिंह चम्पारण की देखभाल करते रहे. इतिहास गवाह है कि राजा की उपाधि जदु सिंह के लड़के उग्रसेन सिंह को सम्राट शाहजहां के शासनकाल में सन् 1629 में दी गई. अर्थात बेतिया राज के प्रथम राजा उग्रसेन सिंह कहलाए. सन 1659 में उग्रसेन सिंह का देहान्त हो गया. उनके बाद उग्रसेन सिंह के एकमात्र पुत्र गज सिंह राजा बने जो 1694 तक राज करके स्वर्ग सिधार गए. इनके सबसे बड़े लड़के दिलीप सिंह को 1694 में राजा बनाया गया, लेकिन 1715 में यह भी परलोक वासी हो गए. इसके बाद इनके बड़े पुत्र ध्रुव सिंह को राजा बनाया गया. यह अब तक के सबसे सफल राजा माने गए. इन्होंने ही सुगांव से हटाकर बेतिया को अपनी राज की राजधानी बनाया.
कहा जाता है कि ध्रुव सिंह को कोई पुत्र नहीं हुआ. केवल दो लड़कियां हुई. ध्रुव सिंह ने देखा कि उनके पुत्र हीन होने के चलते उनका राज भाईयों के हाथ चला जाएगा, यही सोच कर उन्होंने अपने जीवन काल में ही अपने पुत्री के पुत्र युगलकिशोर सिंह को राज तिलक देकर राजा बना दिया. इस तरीके से ध्रुव सिंह ने अपने भाईयों के हाथ रियासत की सत्ता जाने से बचा तो ली मगर परिवार के बीच खाई जरूर पड़ गई. ध्रुव सिंह की मृत्यु 1762 में हो गई.
ध्रुव सिंह के मृत्यु के बाद राजा युगलकिशोर सिंह के ताज में कांटें लग गए. एक तरफ नाना के भाईयों का विरोध और दूसरी तरफ ईस्ट इंडिया कम्पनी की दहशत.. तनाव में आकर वे 1766 में ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरूद्ध विद्रोह कर बैठे. विद्रोह दबाने के लिए कोलोनेल बारकर की अगुवाई में ईस्ट इंडिया कम्पनी के सिपाहियों ने बेतिया राज पर चढ़ाई कर दी। आखिरकार युगलकिशोर को भागना पड़ा. राजा युगलकिशोर के भागने के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी ने पूरे चम्पारण सरकार को अपने कब्ज़े में ले लिया.
वे पटना राजस्व परिषद द्वारा निर्गत परवाने के अनुपालन में सारण सरकार के सुपरवाइजर के समक्ष 25 मई 1771 को उपस्थित हुए और आत्म-समर्पण के बाद अगस्त 1771 में परगना मझौआ एवं सिमरौन हेतु अम्लदस्तक तैयार कर उन्हें दे दिया गया. युगलकिशोर सिंह की मृत्यु 1784 में हो गई, इसके बाद उनके पुत्र बृजकिशोर सिंह अपने पिता का मालिकाना हक पाते रहे. 1816 में यह भी दुनिया छोड़ कर चले गए.
इसके बाद इनके बड़े लड़के आनन्द किशोर सिंह ने सारण के कलेक्टर के यहां दाखिल खारिज कराकर एवं कुछ शर्तो को कबूल करके बेतिया राज को प्राप्त किया और इन्हें इस समय महाराजा की उपाधि से विभूषित किया गया. आनन्द किशोर सिंह संगीत प्रेमी थे, इन्हीं के समय ध्रुपद गायन की परम्परा बेतिया में चली. 29 जनवरी 1838 को महाराजा आनन्द किशोर स्वर्ग सिधार गए. इन्हें कोई संतान नहीं थी, इसलिए उनके भाई नवल किशोर राजा हुए. इन्होंने बेतिया राज का काफी विस्तार किया और 25 सितम्बर 1855 को यह भी काल के गाल में समा गए. इसके बाद पहली पत्नी के पुत्र राजेन्द्र किशोर सिंह गद्दी पर बैठे. इन्होंने बेतिया राज का काफी विस्तार किया. इनके दौर में ही बेतिया में रेलवे लाईन बिछी और ट्रेन चली. बेतिया का तारघर भी इनके कार्यकाल में बना. इन्होंने ही बनारस में अवतल बनवाएं और इलाहाबाद में घर खरीदा, (विशेष बात यह है कि इसी घर को देखने के लिए  सिनेमा जगत के महानायक अमिताभ बच्चन ने बचपन में चोरी की थी.) 28 दिसम्बर 1883 को वे भी भगवान के प्यारे हो गए.
इनके मौत के बाद महाराजा हरेन्द्र किशोर राजगद्दी पर बैठे. और यही बेतिया राज के अंतिम महाराजा थे. इन्हें कोई संतान नहीं थी. 24 मार्च 1893 को इस दुनिया को अलविदा कह गए. इनकी दूसरी पत्नी 27 नवम्बर 1954 तक बेतिया राज दरबार को रौशन रखा. उसके बाद से बेतिया राज हमेशा-हमेशा के लिए अंधेरे में चला गया



गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण व सम्बर्धन में अपना अंशदान दे कर पुण्य अर्जित करें


भारतवर्ष के बिहार राज्य के पच्छिम चम्पारण के मुख्यालय स्थित बेतिया शहर का गौरव, देवासुर संग्राम मे देवताओ के बिजय का प्रतिक चिन्ह, अनेको ऋषियोँ व राजबंशो का गौरव गाथा अपने मे समेटे यह नागर शैली की अनुपम कृती एवं प्रतीदिन अर्थाभाव एवं समय के थपेड़ो से घायल सार्वजनिक शोषण का शिकार यह दुर्गाबाग आज कोर्ट ऑफ वाड्स के अधिन अपने उद्धारक एवं सहयोगीयोँ की बाट जोह रहा है,1500 रुपया से अधिक या ८० घंटा बार्षिक श्रम   सहयोग  देसकने मे सक्षम भक्त स्थाई सहयोगी सुची मेँ अपना नाम अवश्य दर्ज करावे, आपके जनसहयोग से ही ये तमाम नितांत कार्य आपके सहयोग की गतिसे ही सम्पन्न कराये जाएंगे, - 1:-"मन्दिर मरम्मती व सौन्दर्य करण तथा रंग-रोगन" का कार्य
2:-"
मंदिर के 11एकड़ 60डिसमिल भुखण्ड की चरदिवारी निर्माण", आठ गेट व फाटक निर्माण, मंदिर मे विशेष अवसरो पर उमड़ने वाली अनियंत्रित भीड़ को नियंत्रित व पंक्तिब्द्ध करने के लिए मंदिर के तालाब के पास के अति प्राचीन महाकाल मंदिर से माँ दुर्गा के गणेश मंदिर तक ओवर ब्रिज का निर्माण व व्यवस्था 

3:- हनुमान मंदिर के पूरब वाले भूखंड मे " बाहन पार्किँग, अष्टयाम स्थल,  खान-पान-स्थल, छेका-स्थलयात्रीपड़ावसार्बजनिक-शौचालय तथा स्नानस्थल का निर्माण":-" व बैठका की व्यवस्था
4:-बाहरी तीर्थ-यात्रियों व अतिथियों के सुविधार्थ 
पाँच-पाँच शौचालय से युक्त"36पलैट अत्याधुनिक सुबिधाओ से लैस धर्मशाला निर्माण तथा प्रवचन स्थल निर्माण आज अविलंब व नितांत है 
आप-सब अपना सहयोग शाक्त-समाज के वार्षिक सहयोगी बनकर दें,  राकेश चन्द्र झा बब्लू, (संचालक व बेतिया-राज-पुजारी) के नाम से या सीधे सम्पर्क करके दें (पावती रशीद अवश्य ले) या दान पात्र मे गुप्त-दान करे
अधिक जानकारी के लिए फोन करे 06254238572 
या +919431491033(आपके द्वारा दिया गया चंद सहयोग हिं यहाँ खोलेगा विकाश व सौनदर्यीकरन का बंद दरवाजा) 

रविवार, 9 सितंबर 2012

उपेन्द्र नारायण झा `अघोर`दिनॉंक 27-04- 2015 को पंचतत्व मे समाहित

प्रसिद्ध तांत्रिक श्री उपेन्द्र नारायण झा अघोर का जन्म बेतिया प०चम्पारण जिले के साठी में ३-१०-१९४९ ई० को हुआ,पिता स्व० जटाशंकर झा(ज्योतिष) एवं माता स्व० मुन्नी देबी के पुत्र अघोर की प्राथमिक शिक्षा राजपुर बिद्यालय से हुई तथा माध्यमिक शिक्षा उच्च विद्यालय नरकटियागंज से हुई जहाँ से आपने मैट्रिक की परीक्षा १९६७ ई० में पास किया आप महारानी जानकी कुअर महाविद्यालय बेतिया से सन १९६८ में प्रवेशिका परीक्षा उत्रिण करने के बाद पुन: इसी विद्यालय से १९७२ ई० में अर्थशास्त्र विषय से स्नातक प्रतिष्ठा की योग्यता  प्राप्त की , पुन: आपने संस्कृत से मध्यमा एवं शास्त्री किया , इसी बिच आपका विबाह मुजफ्फरपुर जिले के शीतल पट्टी मीणा पुर निवासी स्वर्गीय पं० इन्द्रजीत झा जो राज मंदिर दुर्गाबाग बेतिया के वंशानुगत सहायक  पुजारी थे, की सुपुत्री मालती झा से ११-५-१९६९ में सम्पन्न हुआ, आपके सात संतानों में चार पुत्र, राकेश चन्द्र झा बबलू , मुकेश चंद्र झा , सतीश चन्द्र झा रंजन, नितेश चन्द्र झा बाबा तथा तिन पुत्रियां , नीलम, किशोरी तथा शिल्पी हुई,बाल्य काल से हीं धर्म-आध्यात्म में आपकी आस्था थी, बाल्य काल में भी आप अपने सहपाठियों के साथ खेल में भाग न लेकर मंदिर के साफ-सफाई में लगे रहते थे, आपकी कठिन भक्ति के कारण आपका माता से बिभिन्न रूपों में साक्षात्कार हुआ करता था, जिससे आप धर्म के मार्ग में चलने को प्रेरित होते रहे , अध्ययनोपरान्त आप यज्ञनारायण में प्रवृत हुए और उचित मार्गदर्शन हेतु गुरु की तलाश करने लगे ,तदोपरांत १९७३ ई० में परम पूजनीय श्री श्री अवधूत भगवान श्री राम जी से दीक्षा ग्रहण कर योग साधना ,तन्त्र साधना और कपाली साधना में लिन होगये , साधना के कठिन ब्रतों का निरंतर अनुपालन करते हुए माता की कृपा से आपको कई सिद्धियाँ प्राप्त हुई जिनमे तन्त्र सिद्धि प्रमुख है ,संत रूप में अघोरी पन्थ परम्परा में अघोर उपनाम आपके नाम के साथ जुड़ा, ........इस पन्थ के दाइत्व का निर्वहन करते हुए गुरु शिष्य परम्परा के तहत पुरे भारत में आपने हजारों शिष्यों को दीक्षा दिया , तन्त्र साधना को आगे बढाने के लिए अपने उपास्य गढ़ी माइ की असीम कृपा से राजपुर जंगल में एक विशाल मंदिर की आपने स्थापना की, आपका लोक कल्याणकारी जीवन , माँ की भक्ति के साथ ताप-संताप से ग्रसित दुख: पीड़ित मानव सेवा में उत्सर्जित रही, तांत्रिक और औषधिय उपायों से मानव समाज को खुशियां बाँटना ही आपका मूल कार्य था , लाभ- लोभ से रहित आपका निष्काम जीवन पूर्णत: भक्ति साधना के निमिक्त रहा, यही कारण है कि आपने राजमंदिर दुर्गाबाग के पुजारी का पद स्वीकार नही कर आपने यह कार्य अपनी भार्या श्रीमती  मालती देवी के कंधे पर डाल दिया ,आप स्वछंद सेवा मार्ग पर अपने मृत्यु काल तक उन्मुख रहे, आपके जीवन का सम्पूर्ण समय दुर्गाबाग मंदिर बेतिया व गढ़ी माइ मंदिर राजपुर नरकटियागंज में पूजा अर्चना और साधना में ब्यतीत होता रही,धर्म अद्यात्म को बढ़ावा देने के लिए आपने दो संस्कृत विद्यालय कि स्थापना कि जो इन्द्रजीत शान्ति संस्कृत प्राथमिक सह उच्च विद्यालय बैतापुर तथा उपेन्द्र मालती संस्कृत महा विद्यालय बैतापुर के नाम से स्थापित है ,आपका यह लोक कल्याणकरी कार्य धर्म- अद्यात्म के साथ-साथ बहुत से लोगो को रोजी रोटी तो दे ही रहा है , हजारों विद्यार्थी इसमें विद्यार्जन कर लाभान्वित हो रहे है आप दिनॉक २७-४-२०१५ को अपना दैैनिक कार्य स्वयं  हिं सम्पन्न कर लेने के बाद १ बजे दिन मे हम सब से बिमुख होकर देवी मई और अमर होगए

बुधवार, 5 सितंबर 2012

दर्देदिल की आवाज


देखा है जिंदगीमे`,हमने ये आजमाके !
देते हैं यार धोखा ,दिलके करीब आके |
किस दुश्मनी का मुझसे , बदला लिया है यारा !


खुश है जहां वाले , मेरा आशिया जलाके |

१:- शाम सूरज को ढलना सिखाती है,शमा परवाने को जलना सिखाती है
आगे बढने में आती है तकलीफे कई, लेकिन ये तकलीफे ही तो इंसान को
आगे बढ़ना सिखाती है
२:- दर्द में कोई मौसम प्यारा नही होता, दिल हो प्यासा तो पानीसे गुजra नही होता
कोईतो देखे हमारी बेबसी, हम सबके होजाते पर कोई हमारा नही होता
३:-सितारों में अकेला चाँद जगमगाता है, अकेला इंसान डगमगाता है
काँटों से मत घबराना ऐ दोस्त, क्योकि कटो` मे ही अकेला गुलाब मुस्कुराता है
४:-आज खुदाने फिर पूछा,तेरा चेहरा उदास क्यों है,तेरी आखों में प्यास क्यों है
जिसके पास तेरे लिये वक्त नही है, वही तेरे लिए खास क्यों है
५:-फूल को कभी खुश्बू का एहसास नही होता, हरकिसी-पर दिल को विब्श्वास नही होता
जरूर खुदा मेहरबान है मुझपर,बरना आप जैसा प्यारा दोस्त मेरे पास नही होता
६:-प्यार आपस में बढाओ तो कोई बात बने, समाज को एक बनाओ तो कोई बात बने
एक धक्के से नही होनेको है ..............,जोर पुरजोर लगावो तो कोई बात बने
७;-संघर्षो के शाये में असली आजादी पलती है, इतिहास उधर मूढ़जाता है जिस ओर जवानी चलती है     

गुरुवार, 29 मार्च 2012

बेतिया राजमैनेज साहब मन्दिरों के शोषण में अब हम आपका बिरोध करेंगे : इसकी सजा भुगतने को तैयार हूँ

बेतिया राज के कोर्ट ऑफवाड्स  के अब  तक  के  मंदिर अधिक्षको में से  आमिर  बनने का  सॉट- कवट हाथ  लगा  चुके  1966 इस्वी से अपने  पद  पर  मरणोपरांत  तक  बने  रहने  का  दावा  करने  वाले  वर्तमान  मंदिर  अधीक्षक द्वारा  बेतिया राज के तमाम मन्दिरों का अब तक के  किए  गए आर्थिक नाकेबंदी को नाकाम करे कही उन्हें  शसक प्रसासक व धर्म रक्ष्को और हमसबका इस गम्भीर  बिषय पर मौन समर्थन  प्राप्त तो नहीं  है ??इस बात की पुष्टि मन्दिरों के रख-रखाव पर एक फूटी कौड़ी भी खर्च नही करने वाले राजस्व परिषद से मन्दिरों के शोषण के लिए जारी नित्य नये तुगलकी फरमानों से हो जाता है .........,इनसब से उबकर कुछ और करने को दिल बेचैन सा हो जाता है,आज दिनांक 9/7/2013 को शाम के 4 बजे राज मैनेजर अपने कार्यालय में एक बैठक बुलये थे, मै भी गया था, बैठक के अंत में सबको एक-एक रसीद बही दिया जाने लगा,सब लोग सहर्स लेकर उससे प्राप्त राजस्व राज के खजाने में जमा करने का संकल्प ले रहे थे ,
........ मै नही लिया , उनलोगों ने मुझसे कारण पूछा , मै - श्री मान जब  मन्दिरों के रख-रखाव सुविधा में विकास का सब्जबाग दिखाकर 1964 ईस्वी में मन्दिर के तमाम अतिथिशालाओं का लीज  कौड़ीयो के भाव  में किया गया 'तमाम भूखंडों का लीज भी किया गया बगीचों के पेड़ो से फलो और तालाब का डाक तो हर वर्ष हो रहा है ,1995 ईस्वी से लगातार यज्ञ व अष्टयाम से शुल्क बढोत्तरी के क्रममें लगातार वसूली हो रही है  ........ ....... ऐसे में माली, टहलू, सिपाही,ववार्ची,पेंट-पोचरा समेत तमाम मन्दिर रख-रखाव व सफाई तथा सुरक्षा  समबंधित तमाम बुनियादी व्यवस्थाये निरस्त कर ,पुजारियों को दीजारही नगण्य राशी को ही मन्दिर रख- रखाव की राशी बतलाया जा रहा है... ऐसे में मै जो रशीद से वसूल कर दूंगा उसे आप मन्दिर में ही खर्च करेंगे,पुजारियों व भक्तो द्वारा हो रहे मन्दिर संचालन से आप बेहतर संचालन करेंगे लिखित  आश्वसन दे ......
अन्यथा जो भक्त पेंट-पोचरा,टूट-फुट मरम्मत में सहयोग करता है उस भक्त के गाड़ी पूजन, कथा व विवाह से दक्षिणा के आलवे क्रमस:151रुपया, 51 रुपया, 1100 रुपया का रशीद काटने में मै अपने को असमर्थ पारहा हु,........,श्रीमान मन्दिरों का शोषण अतिक्रमण का पोषण तथा बेतिया राज के मन्दिरों को नष्ट करने की साजिस अब मै सहने में अक्षम महसूस कर रहा हूँ,........,हाँ अगर सर्वोच्च न्यालय के आदेशो का अनुपालन करके कमसे कम मन्दिरों के भूखंडों को 1856 ईस्वी के स्थिती में बहाल करदेते है तब आज के वर्तमान दर से किसी भी मन्दिर को उन भूखंडों का कर आपके राज खजाने में जमा करने में कोई आपत्ति नही होगी ,........ यु तो तमाम लौकिक विद्याओं का विकास लाठी और अग्नेआस्त्रो के ही बल परहीं  होता है , लेकिन मै कोर्ट ऑफ वाड्स के अधिनस्त बेतिया-राज के तमाम मन्दिरों के शोषण के खिलाफ रख-रखाव निति बनाने के लिए सरकारों को अपने लेखन कला के जरिये विवश करने का पक्षधर हूँ   

कई पीढियों से मंदिलो का देख भाल करने  के बाद भी मन्दिरों का बेलगाम शोषण व अतिक्रमण करने वाली शक्तिया हावी होते जा रही है बचावो ....... इसे शेयर करो तथा मेरा मनोबल बदावो
`` आपका आशीर्वाद ही मेरा भविष्य है ``